मेरे एक मित्र ने मुझे ब्लॉग लिखने के लिए कहा। कुछ लोग पहले भी कह चुके हैं। मै किसी काम को जोश के साथ समाप्त न कर पाने की अपनी पुरानी आदत के डर की वजह से अपने शुभचिंतको की सलाह पर गौर न कर पाया। खैर, आज से नयी शुरुआत करते हैं बावजूद इसके की आज गर्मी भी बहुत पड़ रही है, मेरा एक शोध पत्र भी ख़ारिज हो गया है, और मेरी पी. एच .डी . की फीस में भी बढोत्तरी कर दी गयी है। इन तीनो परेशानियों में मुझे वज़ह एक ही नज़र आती है। शायद वज़ह हूँ मै खुद।
मै , आपकी ही तरह हमारे लोकतंत्र का एक प्रमुख हिस्सा हूँ। उस लोकतंत्र का जो मेरे लिए मेरे द्वारा चुनी गयी सरकार से मेरी ही तमाम महत्वाकांक्षाओं और बुनियादी जरूरतों का गला घोंटता है। कुछ कहता हूँ तो कह दिया जाता है की मै जनता नहीं हूँ। सरकार जनता के लिए है मेरे अकेले के लिए नहीं। मानता हूँ कि मै जनता नहीं हूँ , फिर भी मै अपने देश की 125 करोड़ जनता में से कम से कम 120 करोड़ लोगो का प्रतिनिधित्व तो करता ही हूँ। क्योंकि मेरी तरह इस देश के 120 करोड़ लोग सोचते हैं। उनको भी मेरी तरह की बहुत सारी समस्याएं हैं , अपने लोकतंत्र द्वारा स्थापित सरकार से या सरकार की वजह से । बाकी बचे 5 करोड़ लोग वो हैं जो मुझे जनता बनने से रोकते हैं। ये ही सरकार चलाते हैं , राज करते हैं और वास्तविक रूप में असली जीवन का आनंद लेते हैं। शायद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता की ये संख्या बहुत ही कम है। लेकिन हाँ , अगर जनता सिर्फ ये ही तथाकथित सभ्रांत लोग ही हैं तो नित रोज़ आने वाले हमारे देश की प्रगति के आंकड़े पूरी तरह सही ही हैं। देश प्रगति कर रहा है , इसकी जनता प्रगति कर रही है।
मै अपनी समस्याओं पर वापस आता हूँ, जिनकी वजह भी मै ही खुद हूँ । कैसे ? एक एक कर के लेता हूँ। सबसे पहले गर्मी। मुझे गर्मी बहुत ज्यादा लगती है, जिसकी वजह ये है की में एयर कंडिशनर का इस्तेमाल नहीं करता। मेरे पास A C हो या न हो इस से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। अगर नहीं है तो मै जिम्मेदार और है भी तो मै जिम्मेदार। क्यूंकि A C ले लेने भर से गर्मी का प्रकोप दूर नहीं हो जाता है। उसके लिए पर्याप्त बिजली की जरुरत होती है जो देश की सरकार अपनी जनता के लिए ही तो देगी, मुझे तो देगी नहीं। हकीकत में देती नहीं है। या तो मेरे मोहल्ले में लाइट आती नहीं है या फिर आती है तो सिर्फ इलेक्ट्रिक बल्ब के फिलामेंट को प्रकाशमय करने के लिए। और समस्या की जड़ में जो सरकार है उसके लिए भी आप लोग मुझे दोषी कहेंगे। काहे को चुनते हो भैया ऐसी निकम्मी सरकार।
दूसरा , मेरा एक शोध पत्र जो ख़ारिज हुआ है उसमे तो बिना संदेह में ही जिम्मेदार हूँ। मै इसकी कोई वजह का बहाना बनाना चाहता भी नहीं हूँ। तीसरा पी. एच .डी . की फीस भी मेरी सरकार ने ही बडाई है, बजट चाहिए न देश की और देश की जनता की प्रगति के लिए। काहे को चुनते हो भैया ऐसी निकम्मी सरकार। मेरी तीन में से दो समस्याओं में वज़ह मेरा खुद का लोकतंत्र ही है। वास्तविकता में ऐसा हम सभी 120 करोड़ के साथ होता है।होता भी रहेगा?
आज के दिन से शुरुआत हुई है , शुरुआत में ही दिन भर घटनाक्रम का जो दौर चला उस का प्रभाव रहा होगा मेरे लेखन में, जिसे स्वाभाविकता का पहलु समझ कर आप आत्मसात कर लेंगे, मुझे आशा है।
मै , आपकी ही तरह हमारे लोकतंत्र का एक प्रमुख हिस्सा हूँ। उस लोकतंत्र का जो मेरे लिए मेरे द्वारा चुनी गयी सरकार से मेरी ही तमाम महत्वाकांक्षाओं और बुनियादी जरूरतों का गला घोंटता है। कुछ कहता हूँ तो कह दिया जाता है की मै जनता नहीं हूँ। सरकार जनता के लिए है मेरे अकेले के लिए नहीं। मानता हूँ कि मै जनता नहीं हूँ , फिर भी मै अपने देश की 125 करोड़ जनता में से कम से कम 120 करोड़ लोगो का प्रतिनिधित्व तो करता ही हूँ। क्योंकि मेरी तरह इस देश के 120 करोड़ लोग सोचते हैं। उनको भी मेरी तरह की बहुत सारी समस्याएं हैं , अपने लोकतंत्र द्वारा स्थापित सरकार से या सरकार की वजह से । बाकी बचे 5 करोड़ लोग वो हैं जो मुझे जनता बनने से रोकते हैं। ये ही सरकार चलाते हैं , राज करते हैं और वास्तविक रूप में असली जीवन का आनंद लेते हैं। शायद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता की ये संख्या बहुत ही कम है। लेकिन हाँ , अगर जनता सिर्फ ये ही तथाकथित सभ्रांत लोग ही हैं तो नित रोज़ आने वाले हमारे देश की प्रगति के आंकड़े पूरी तरह सही ही हैं। देश प्रगति कर रहा है , इसकी जनता प्रगति कर रही है।
मै अपनी समस्याओं पर वापस आता हूँ, जिनकी वजह भी मै ही खुद हूँ । कैसे ? एक एक कर के लेता हूँ। सबसे पहले गर्मी। मुझे गर्मी बहुत ज्यादा लगती है, जिसकी वजह ये है की में एयर कंडिशनर का इस्तेमाल नहीं करता। मेरे पास A C हो या न हो इस से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है। अगर नहीं है तो मै जिम्मेदार और है भी तो मै जिम्मेदार। क्यूंकि A C ले लेने भर से गर्मी का प्रकोप दूर नहीं हो जाता है। उसके लिए पर्याप्त बिजली की जरुरत होती है जो देश की सरकार अपनी जनता के लिए ही तो देगी, मुझे तो देगी नहीं। हकीकत में देती नहीं है। या तो मेरे मोहल्ले में लाइट आती नहीं है या फिर आती है तो सिर्फ इलेक्ट्रिक बल्ब के फिलामेंट को प्रकाशमय करने के लिए। और समस्या की जड़ में जो सरकार है उसके लिए भी आप लोग मुझे दोषी कहेंगे। काहे को चुनते हो भैया ऐसी निकम्मी सरकार।
दूसरा , मेरा एक शोध पत्र जो ख़ारिज हुआ है उसमे तो बिना संदेह में ही जिम्मेदार हूँ। मै इसकी कोई वजह का बहाना बनाना चाहता भी नहीं हूँ। तीसरा पी. एच .डी . की फीस भी मेरी सरकार ने ही बडाई है, बजट चाहिए न देश की और देश की जनता की प्रगति के लिए। काहे को चुनते हो भैया ऐसी निकम्मी सरकार। मेरी तीन में से दो समस्याओं में वज़ह मेरा खुद का लोकतंत्र ही है। वास्तविकता में ऐसा हम सभी 120 करोड़ के साथ होता है।होता भी रहेगा?
आज के दिन से शुरुआत हुई है , शुरुआत में ही दिन भर घटनाक्रम का जो दौर चला उस का प्रभाव रहा होगा मेरे लेखन में, जिसे स्वाभाविकता का पहलु समझ कर आप आत्मसात कर लेंगे, मुझे आशा है।
No comments:
Post a Comment