Wednesday, July 11, 2012

अब कोई राम नहीं हमारा धनुष जो तोड़े
   ज़िन्दगी रोती  है सीता के स्वयंवर की तरह


किसी मशहूर शायर के कहे गए ये लफ्ज़ आज लगभग हर शख्स की जुबाँ से किसी न किसी तरह  सुनाई पड़ सकते हैं। हर कोई परेशां है , किसी को कोई परेशानी है तो दूसरे को कोई और। शायर अपनी ज़िन्दगी रुपी सीता के उद्धार (सहारे ) के लिए किसी राम की उम्मीद में हैं शायद । वैसे तो ये संसार पूरी तरह से दुःख का ही समुन्दर है , जैसा की भगवान  खुद ही गीता में कहते हैं "दुःखालयम अशाश्वतम"। पर सिर्फ सार्वभौमिक आध्यात्मिक तथ्य  के अलावा अन्यान्य कारणों पर विचार न करने की  हमारे पास कोई खास वज़ह भी नहीं है। अन्य कारण भी हैं हमारे दुःख के।

                          तथाकथित विकास और तदावश्यक सामजिक परिवर्तन की बयार में हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की  अनदेखी और अवहेलना किये जाने से  एवं  हमारी जीवन शैली की मूलभूत संरचना की अति-निर्ममता से धज्जियाँ उडाये जाने से  जो परिस्थितियाँ पैदा हुई है , मेरी नजर में आम जीवन में दुख का बहुत बड़ा कारण है।
विकास और विकसित की परिभाषा में जो अनावश्यक और अवांछनीय अंतर  हमारे नीति नियंताओं ने पैदा किया उसने एक आम हिन्दुस्तानी की सामान्य जीवन के प्रति  सोच ही बदल डाली। हमारे नीति निर्धारक ये भूल गए की विकास की पुरानी परिभाषाएं जो काल कालांतर से चली आ रही थीं , हमारे अत्यंत ही विस्तृत और दूरगामी सोच रखने वाले पूर्वजों ने , जो की अपने आम जीवन में ऋषि स्वरुप थे, अत्यंत गहन शोध के बाद ही गडी थीं। बिना किसी ठोस वजह के, कुछ स्वार्थपरक लोगों द्वारा उनको बदल दिया गया। ये परिवर्तन के दौर से गुजर रहे भारतीय समाज के स्व-निर्मित संभ्रांत लोग थे। विडम्बना ये रही की हम समझ नहीं पाए की ये अपने लोग उन अंग्रेज आताताइयों से जितने चमड़ी में अलग थे  उतने सोच में नहीं थे। सोच वही की वही  रही ,और हम लुटते रहे। बेशक अपनेपन की भावना और उसके फलजनित उम्मीदों ने हमें बहुत समय तक इस भयावह लूट को महसूस नहीं होने दिया। बदलती सामाजिक परिस्थितियों में, कुछ लोक-सुधारकों के प्रयास के बाद , आज हमें जब ये अपनों द्वारा लुटे जाने का दर्द महसूस होने लगा है, तो दुःख तो होंगे ही । इस बात का दुःख की उन्होंने हमें लूटा। दुःख इस बात का भी की जिन सामाजिक संसाधनों पर हम सबका बराबर हक था उन संसाधनों का दोहन सिर्फ इन लोगो ने ही किया। और दुःख इस बात का भी की ये बड़ते रहे और हम गिरते रहे , बावजूद उन लौलीपौपों  के जो हमारे द्वारा अपने कहे जाने पर पर इन्होने हमें दी।
                          
                           मुझे याद है, नब्बे के दशक में बाजार में एस. टी . डी. पीसीओ की दुकान होना अच्छा खासा रोज़गार मन लिया जाता था, उसी तरह जिस तरह किसी छोटे कस्बों में दवाइयों की दूकान का होना। इन छोटे छोटे रोजगारों की सामजिक स्वीकरोक्ति का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है की ये रोज़गार किसी बाप के लिए अपनी बेटी का रिश्ता कर देने के लिए पर्याप्त हो जाते थे, बशर्ते लड़के का रहने के लिए अपना घर हो, थोड़ी बहुत ही सही पर खुद की ज़मीन (खेत ) हो , और उसका परिवार अच्छा हो। मै  मध्यवर्गीय परिवारों की बात कर रहा हूँ, क्योंकि में मानता हूँ कि  संभ्रांत लोगो पर टिपण्णी करने से हमारी लेखनी के उद्देश्य की पूर्ति  नहीं हो सकती है। आज समय बदल गया है। हम इंजिनियर लड़का देखने जाते हैं, उसके परिवार और अचल सम्पदा की जगह उसकी मार्कशीट और जॉब ऑफर की तहकीकात करते हैं, क्यूकि हम कही न कही उस परिवार की विश्वशनीयता पर सवाल  उठाते हैं अपनी सामाजिक साख  के ख़राब हो जाने के दर से । अपनी बेटी के सुख और उसके  भविष्य  के तमाम  मानवीय पहलुओं को नज़र अंदाज़ कर के , हम अपनी पसंद का इंजिनियर डॉक्टर लड़का ढूडने की कोशिश करते  है। शायद वर्तमान में हमारे विकसित होने की परिभाषा यही है। और इस परिभाषा में नैसर्गिक  सुख संबंधी किसी मानवीय दूरदर्शिता और भावनात्मक परिपक्वता का पुट नहीं है। बात इंजिनियर डॉक्टर की नहीं है, बात है हमारी सोच में आये परिवर्तन की। हमें वर्तमान विकास और आधुनिकता के छलावे ने ये भुला दिया की हमारे समाज में विश्वास की पराकास्ठा तो उस हद तक रही है की हम अपनी बेटी का हाथ उस उस वर को देते रहे थे जिसे गाँव बस्ती के किसी व्यक्ति द्वारा चुन लिया जाता था। विकास की आधुनिक परिभासा में सहकारिता और सामूहिक विश्वास की कमी भी हमारे दुःख का एक कारण है।

                    हम में से बहुत नहीं जानते की स्पेक्ट्रुम क्या होता है , कॉमनवेल्थ खेल क्या होते हैं । पर हमें बताया जाता है की सिर्फ एक्स वाई क्रोमोसोम्स की वज़ह से पैदा किसी पुराने पापी का बेटा कौन है। हमारी समस्याओं की जगह उस अनुवांशिक गन्दगी का महिमामंडन किया जाता है, जिसके कारक से तो हम पहले से ही त्रस्त है। फिर पैदा होते हैं चापलूस जो ये समझ बैठे हैं की उनका वजूद सिर्फ इन राजकुमारों की लल्लो-चप्पो में ही है। शुरू होता है आरोपों प्रत्यारोपों का दौर। नरेन्द्र मोदी कौन हैं। हम में से ज्यादातर लोग उनके बारे में सिफ उतना जानते हैं , जितना कांग्रेस हमें बताती है, या बी.जे.पी हमें बताती है और दोनों को सुनने के बाद हम जो अपने मन में विश्लेषण करते हैं। सांप्रदायिक विकास पुरुष।जिन लोगो को हमारी समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए था उन लोगो ने खामख्वाह एक भारतीय को हिंदुत्व का मसीहा बना दिया और फलस्वरूप उसे मिल गयी प्रसिद्धि और समान विचारधारा में लोकप्रियता। ऐसे कई लोग हैं , चाहे वो नाचने गाने वाले हों, खेलने कूदने वाले हों या लोकतंत्र की नौटंकी के अहम् सूत्रधार हों, जिन की लोकप्रियता की वज़ह से हासिले पर चले गए अन्ना हजारे, बाबा राम देव , और इन जैसे तमाम लोग जो हमारी आवाज़ बनने की कोशिश करते रहे हैं। वास्तविकता ये है की इस देश के आम आदमी को न तो किसी नौटंकी वाले से मतलब है न ही किसी फूहड़ जोकर से। ये वास्तविकता कांग्रेस और अन्य पार्टियाँ अच्छी तरह से जानती है। दुःख इस बात का है की हमारे सब्र के इम्तिहान लेने से ये राजनीतिक खटमल बाज़ नहीं आ रहे हैं ,और इस बात का भी दुःख है की एक अदद जबाब की बजाय हम इम्तिहान दिए जा रहे हैं।

                        धर्मं बाहुल्यता और , जातिवाद जिसे हर भारतीय अनेकता में एकता के रूप में अपने देश की मजबूती समझता आया था , आज वो सोच सम्प्रदायिकता और आरक्षण के दकियानूस शब्दों ने बदल दी है। किसने बदली हम जानते हैं। क्यों बदली ये भी हम जानते हैं , फिर भी कुछ करते नहीं हैं। इसी बात का तो सबसे बड़ा दुःख है की जनता हुए भी हम वो सब कुछ नहीं करते जो हमारे सांसारिक और आदिभौतिक सुखों के लिए ज़रूरी है।                           आपके विचार प्रार्थनीय हैं।



                                                                                                                      प्रभात शर्मा






1 comment:

  1. bahut sundar,

    vicharon ka aaveg to kafi hai parantu kahin kahin shabd bhatak jate hain....
    अत्यंत गहन शोध के बाद ही गडी थीं।
    jaise shabd hai gadhi, per likh gaya hai gadi...

    lage rahiye umeed hai age ke vichar aur samyak honge....

    ant mein kuch kuch bikhrav hai.....

    shayad man mein vichar bahut hain per haathon ki typing shakti seemit.....
    4-6 post ke baad ye bhi line pe aajayenge....


    prayas sarahaniya hai....

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