Wednesday, October 28, 2015

सार्थक सार बने जीवन का प्रयास करो, 
न कि राग द्वेष में तुम दिन रात करो।
काल चक्र का प्रक्रम तो है सर्वविदित ही,
 न रुका कभी न आज रुकेगा, मुझे पता है।


सम्राट श्रेष्ठ भी कालजयी न हुए न होंगे,
 विषकन्ठ हलाहल सृजन हानि को पर तत्पर हैं। 
अद्भुत साहस लिए सहस्र आते जाते हैं, 
मैं भी जाउंगा और तू भी, मुझे पता है।

प्रकृति का मूल तत्व है प्रेम सुना है, 
पर प्रेम विवशता ही  महाभारत की जननी है। 
इच्छाओं की एक महत्त मात्रा जो होती, 
परम त्रिसत्य तुझको मिल जाता, मुझे पता है।

सपने अपने हुए किसी के कभी भला क्या?,
क्यों फिर धुन में अपनी खुद को भूल रहा तू?
चलचित्र जगत है अभिनय वांछित तुझे ज्ञात हो
मैं और तू किरदार  यहाँ हैं,मुझे पता है।

मैं निपुण नहीं न तू भी इतना कि हम समझें, 
जगत सार की क्या अन्तिम परिभाषा होती?
प्रेम समागम सूक्ष्म तत्व से भिन्न यहाँ पर,
विरह मूल हो ये सम्भव है, मुझे पता है।

ह्रदय रिक्ति की विमा तुझे क्या पता नहीं हैं, 
फिर वियोग का क्यूं तू प्रतिपादन करता ,
सृष्टि तेरी क्या भौतिकी का नियमन भर?
नहीं! भाव की ये सरिता है,मुझे पता है।

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