मैं तेरी मुस्कान पे मोहित कभी नहीं था,
पर आंखों का नीर चीर मैं नहीं सका क्यों?
आज डुबो कर हाथ छुड़ाया तूने मुझसे,
आज डुबो कर हाथ छुड़ाया तूने मुझसे,
कल कोई फिर से डूबेगा,मुझे पता है।
छका झमाझम विप्लव को ये विजयी नेत्र,
तेरी नियति पे क्यों होते हैं पुन: प्रवाहित ?
तेरे स्वप्निल उन्माद में जैसे मैं टूटा हूँ,
तेरी नियति पे क्यों होते हैं पुन: प्रवाहित ?
तेरे स्वप्निल उन्माद में जैसे मैं टूटा हूँ,
तुझे ज्ञात हो तू भी टूटेगा, मुझे पता है।
बन पथिक राह का तेरी मैंने योजन नापे,
न छोड़ा कोई अनन्त स्वप्न आकाश शेष ही,
पर नियति का न्याय हुआ कुछ तेरे जैसा,
कैसा? दर्पण में जो दिखता, मुझे पता है।
न छोड़ा कोई अनन्त स्वप्न आकाश शेष ही,
पर नियति का न्याय हुआ कुछ तेरे जैसा,
कैसा? दर्पण में जो दिखता, मुझे पता है।
उत्सुक कोई मूक बधिर सा प्रेमान्ध कवि ये,
दग्ध ताप ले अन्तस में चुप चाप रहा क्यों?
आशाओं की सीमाएं आकाश नहीं है,
क्षितिज आज तुझको पायेगा, मुझे पता है।
दग्ध ताप ले अन्तस में चुप चाप रहा क्यों?
आशाओं की सीमाएं आकाश नहीं है,
क्षितिज आज तुझको पायेगा, मुझे पता है।
विषय निषेध रही जिज्ञासा कर्मों के फल की,
पर बिन फल कहाँ हुई हमारी पूरी करनी?
नियम ज्ञान ही अपराधों का मूल तत्व है,
प्रेम नियम अब तू सीखेगा, मुझे पता है।
पर बिन फल कहाँ हुई हमारी पूरी करनी?
नियम ज्ञान ही अपराधों का मूल तत्व है,
प्रेम नियम अब तू सीखेगा, मुझे पता है।
समय शास्त्र का नियम प्रेयसी गजब निराला,
प्रेम युद्ध यश अपयश में बस दर्शक रहना!
सदी दर्द की मेरी तेरा क्षण भर ही थी,
प्रेम युद्ध यश अपयश में बस दर्शक रहना!
सदी दर्द की मेरी तेरा क्षण भर ही थी,
बीत गई अब निर्णय होगा, मुझे पता है|
जीवन यादों का मेरी श्मशान हुआ क्यों?
क्यों इसकी नन्ही सी इच्छा रही नहीं ?
क्यों सपने बिखरे अपनों के जाने से?
यही पहेली तू बूझेगा, मुझे पता है ।
क्यों इसकी नन्ही सी इच्छा रही नहीं ?
क्यों सपने बिखरे अपनों के जाने से?
यही पहेली तू बूझेगा, मुझे पता है ।
प्रश्न नहीं है कुछ पाने या खो जाने का
बल्कि मेरे स्वयं न अपना हो पाने का!
आश्रय,संयम, भाव, प्रेरणा सब बातें हैं
समय धार से सब छूटेगा, मुझे पता है।
बल्कि मेरे स्वयं न अपना हो पाने का!
आश्रय,संयम, भाव, प्रेरणा सब बातें हैं
समय धार से सब छूटेगा, मुझे पता है।
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