तेरे कंधों की ज़रुरत नहीं मुझको . . .
रूह से रूह मिलाओ, वरना खुदा हाफिज़
रूह से रूह मिलाओ, वरना खुदा हाफिज़
अनुभव कहता है की हमारे संबंधों की परिणिति अगर होती है तो शिकायतों के रूप में या फिर हम उनको सिर्फ बोझा समझ कर ढ़ोते ही रहते हैं। संबंधों की बारीकियों को समझने की कोशिश की तो किसी शायर की इन दो लाइनों के साथ विचार मंतव्य के साथ एकीभूत होने लगे। महसूस हुआ यही सीधा साधा जबाब है। किसी भी सम्बन्ध की बुनियाद सहारे की आवश्यकता पर आधारित होती है तो हश्र भी दुखदायी होता है। सहारे को पाने के लिए सम्बन्ध नहीं, हैसियत चाहिए होती है, खुद की तसल्ली के लिए कह भले ही उसे सम्बन्ध लो। सम्बन्ध में तो सहारे की ज़रूरत होती ही नहीं है। सम्बन्ध की बुनियाद तो पूरकता पर आधारित है। पूर्णता की खोज में , उसके पाने के प्रयास में संबंधों का पड़ाव आना चाहिए। यानि कि सम्बन्ध पूरकता के माध्यम से हमें पूर्णता की ओर ले जाता है, और सहारे मिथ्या संबल के माध्यम से भावनात्मक अपंगता की ओर। रूह से रूह मिलाओ, हम तुम तमाम आत्मायें , स्वतंत्र या आनंदित, मिलकर ही तो पूर्ण परम आत्मा बन सकते हैं। यही संबंधों की जरुरत है और उनकी सृजन होने की आधारभूत वज़ह भी।
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