धर्म और वर्तमान भारत
कुछ लिखने से पहले हम धर्मं की परिभाषा को समझने की कोशिश करते हैं।
1. अंग्रेजी शब्दकोष के अनुसार धर्म की परिभाषा है "The belief in and worship of a superhuman controlling power, esp. a personal God or gods".
2. महात्मा प्रभुपाद के अनुसार धर्म की परिभाषा है "religion is laws of the original source of everything".
3. स्वामी विवेकानंद कहते हैं "आध्यात्मिक विकास एवं दिव्यता की अनुभूति ही धर्म है ".
4. कुरान शरीफ के अनुसार "mazhab or mezheb is a Muslim school of law or fiqh or religious jurisprudence".
5. पवित्र बाइबिल के अनुसार "to fear the Lord your God, to walk in all His ways and to love Him, to serve
the Lord your God with all your heart and with all your soul"
हमारे सनातन धर्मों और धार्मिक क्रियाकलापों का उद्देश्य आध्यात्मिक एवं चारित्रिक विकास ही रहा है। शायद इसीलिए हमारे धर्मों में व्यक्तिगत संलग्नता एवं भावपूर्ण समर्पण की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। परन्तु वर्तमान भारत में जिस तरह धर्मों और धार्मिक क्रियाकलापों के सम्पादन में हानि हुई है, वह कम से कम कल के महान भारत राष्ट्र के हित के लिए तो अच्छा नहीं है। आज हमारे धर्मीं में कोरे अनुष्ठानों के सिवाय कुछ भी नहीं रह गया है। और अधिकतर इन अनुष्ठानों को भी हम किसी पुजारी या पुरोहित को बुला कर संपन्न करवा लेते हैं। कुछ पैसे देकर।
हालांकि हम धर्म के अनुयायी दिखने की कोशिश तो करते हैं पर अपने धर्म के साहित्य में उल्लिखित निषेधाज्ञा संबंधी विषय वस्तु के अनुपालन को आज की आधुनिकता के और मानवीय स्वतंत्रता के खिलाफ कह कर त्याग देते हैं। पैसे के बल पर संपादित हुए धार्मिक अनुष्ठानों का हमारे साहित्यों में पुरजोर खंडन मिलता है "वृत्यर्थं नैव युन्जीत प्राणे : कंठ गतेरपि "। प्राण गले में आकर अटक क्यूँ न जाये हमें भगवत्सेवा न तो पैसे देकर न पैसे लेकर करनी चाहिए। पैसे से यहाँ तात्पर्य भेंट एवं चन्दा एकत्रित करने से भी है। फिर भी दान धर्मं की तोड़ी मरोड़ी हुई तथाकथित परिभाषा की वजह से आज हमारे राष्ट्र में मंदिर, मस्जिद, पुजारी मौलवी और प्रवचन कर्ताओं के साथ साथ कृपा के नाम पर कारोबार करने वाले व्यक्ति एशो आराम और आर्थिक एवं शारीरिक सुख भोग रहे हैं। जो किसी भी रूप में निंदनीय है
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